जलकुंभी के नाम पर नगर निगम ने किया 24 लाख का घोटाला
कभी फरीदाबाद की शान रही बड़खल झील आज नगर निगम के अधिकारियों के लिए ‘सोने का अंडा देने वाली मुर्गी’ बन चुकी है। आरोप है कि झील की सफाई के नाम पर एक ऐसा ‘साइकिल’ तैयार किया गया है, जिसमें पैसा तो पानी की तरह बह रहा है, लेकिन जलकुंभी अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रही।
सफाई का ‘खेल’: दोबारा उगने का बहाना और अंतहीन कमाई
स्थानीय लोगों और जानकारों का मानना है कि जलकुंभी नगर निगम के लिए निरंतर कमाई का जरिया है।
टेंडर जारी होता है, कंपनी सफाई का दावा करती है, और कुछ समय बाद अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि “सफाई तो हुई थी, लेकिन जलकुंभी प्राकृतिक रूप से दोबारा उग गई।” यह पुनरावृत्ति अधिकारियों और ठेकेदारों की जेबें भरने का सबसे सुरक्षित तरीका बन गया है, क्योंकि जांच होने पर भी यह साबित करना मुश्किल होता है कि सफाई हुई ही नहीं थी।
हैरानी की बात यह है कि झील को भरने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के पानी का इस्तेमाल हो रहा है। दावा किया जाता है कि यह पानी ट्रीटेड है, लेकिन यदि इसमें रसायन और सफाई की प्रक्रिया पूरी होती, तो जलकुंभी इतनी तेजी से कैसे फैल रही है? क्या यह ‘ट्रीटेड’ वाटर सिर्फ कागजों पर साफ है? फरीदाबाद की अन्य कृत्रिम झीलें, जैसे डेथ वैली कि झीलें इसका उदाहरण हैं जहाँ जलकुंभी का नामोनिशान नहीं है। ऐसे में बड़खल झील में ही इसका साम्राज्य अधिकारियों की नीयत पर सवाल खड़ा करता है।
अनुबंध के मुताबिक, संबंधित कंपनी को 90 दिनों के भीतर (मार्च 2026तक) काम पूरा करना था। लेकिन धरातल पर काम अधूरा है और समय सीमा नजदीक है। सूत्रों से पता चला है कि एक मशीन तो चली गई लेकिन तीन मशीन मशीनों का टेंडर जारी होने वाला है यानी की लूट का सिलसिला जारी रहेगा।
जब इस बारे में कार्यकारी अभियंता महेंद्र से बात की गई, तो उन्होंने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि फिलहाल उनके पास प्रोजेक्ट की फाइल नहीं है और फाइल आने पर ही स्थिति स्पष्ट होगी।
आरटीआई पत्र के माध्यम से पता लगा है कि 24 लाख 20000 पेमेंट ठेकेदार को पहले से ही कर दिया गया है।
हालांकि कंपनी को 90 दिन में पूरा कार्य करने की आदेश दिए गए थे।काम तो पूरा नहीं हो पाया लेकिन 50 से 60 दिनों में ही कंपनी नौ दो ग्यारह हो गए। हालांकि बताया गया है कि जलकुंभी हटाने का ठेका चंडीगढ़ की सुखना झील के ठेकेदार को दिया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जलकुंभी को जड़ से खत्म करने के लिए विशेष मोटरबोट्स का उपयोग किया जाता है जो इन्हें घेरकर बाहर निकाल फेंकती हैं। एक जलकुंभी से 5000 नई जलकुंभियां पैदा होने की क्षमता होती है, जिसे अधिकारी अपनी ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह स्पष्ट है कि जब तक वैज्ञानिक तरीके से इसे पूरी तरह हटाया नहीं जाएगा, तब तक ‘सफाई और कमाई’ का यह नाटक चलता रहेगा।
बड़खल झील से जलकुंभी कभी नहीं हटेगी, अगर नगर निगम की कार्यप्रणाली यही रही। यह जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी और भ्रष्टाचार का एक ऐसा “वाटरप्रूफ” मॉडल है, जहाँ सारा पैसा पानी में डूब जाता है और अधिकारी चैन की नींद सोते हैं।
इस संबंध में निगम कमिश्नर धीरेंद्र खड़गटा की बात संवाददाता से हुई तो उन्होंने कहा कि अप्रूवल तो दे दिया गया है लेकिन बिलों की जांच की जा रही है।
वॉइस आफ हरियाण हरेंद्र स्वामी












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